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Self-destructive...Wish was born in the 70s.

Monday, February 13, 2012

समय के परे!

ना तो फुर्सत है,  ना  दिन- रात  का  हिसाब  ही  है 

ना मौसिक़ी  है , ना  हमारे  हाथ  में  किताब  ही  है
रात  दौड़ते  हुए  आती  है  और  दिन छू के गुज़र जाता है  ,
कुछ  अंदाजा  नहीं लगता और ये वक़्त  उड्ड जाता है  ...
वक़्त की रफ़्तार तेज़  ना कम होती दिखाई पड़ती है
चंद लम्हें चुरा लें खुद के लिए तो ये घड़ियाँ सिमटती हैं 
आज कल तो मौसम बदलने का अंदाज़ा भी दूसरों के कपड़ों से लगता है 
किस जगह गुजरेंगे आने वाले दिन, ये अखबारों की ख़बरों से लगता है 

एक  दिन  दे दो  लम्बा  सा , रात  को  आते  हुए  तो  देख  सकें 

रात में बैठें छत पे और दिन में धुप सेक सकें  ...

आओगे  इस  बार  तो  ऐसा  करना , दिन  रात  की  चाबी  घर पे छोड़ आना  ..
जेब  में  भर  कर  वो ठहरा  हुआ  सा मोड़  लाना   ...
बैठेंगे वहीं,  महफ़िल  सजायेंगे , समय के परे कुछ  गप्पे  लड़ायेंगे ...
खोल  देंगे  दिल-ओ - दिमाग  की  पोटली  वहाँ ...
दिन है के रात, फर्क ही ना पड़ता हो जहां !!!


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