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Self-destructive...Wish was born in the 70s.

Sunday, December 25, 2011

Sleight of Mind!

हाथ पे लिख कर नाम तुम्हारा, बंद कर दूं ये मुट्ठी तो लगता है की तुमसे कोई contract sign करवा लिया है...
मानो इसके तहत तुम हमेशा मेरे साथ ही रहोगे!


पर भूल से गर पानी छु लेता है इन हाथों को, तो तुम्हारे साथ होने का ख्याल धुल कर बह जाता है!


मुझे अब एक Permanent marker चाहिए!

Thursday, December 22, 2011

मुनिया की खोज !


अल्हड  से  मन  की  अड़ियल  सी  सोच … 
अलसाये  पलों  में  वो  अनजान   खोज .

ख़्वाबों  के  बवंडर  में  ख्यालों  के  गुच्छे…
कुछ  पेड़  फलों  के , कुछ  एवें  से  लच्छे .
 

लच्छों  में  उलझे  उड़ान  के  बुलबुले …
 
एक  छलांग  ख़ुशी  की , कुछ  लम्हे  चुलबुले .
 

उन  लम्हों  के  पार  नयी  सी  वो  दुनिया …
 
एक  कश्ती  से  उस  पार  जाती  मुनिया .
 

मुनिया  की  कश्ती  पे  थपेड़ा  हवा  का  …
 
डोलती  नैय्या  पे  एक  लम्हा  इस  जहां  का .

दुनिया  की  हलचल  में  शोर  घनेरा …
 
मुनिया  की  नीदों  का हुआ  सवेरा .
 

सवेरे  में  फिर  से  वो  अल्हड  सी  सोच …
 
उन  गुच्छों में अटकी मुनिया  की  खोज
!

Wednesday, December 21, 2011

दिल्ली...

बड़ा ही अजीब शहर है यार...
हर मौसम में याद आ जाता है!


ये तेरी सडकें हैं, या इमारतें, या फिर वो तंग गलियां
जिन्हों नें अबी तक मुझे बहार निकलने नहीं दिया है!

मैं सुबह की पहली चाय बेचता हूँ!

रात की अधूरी करवटें ताज़ी सुबह से समेटता हूँ,
कल जो कडवाहट बटोरी थी दिन भर...
उसे अद्रकी धुंए से धो कर खुरंचता हूँ|


रात से भाग कर, जब दिन अंगडाई लेता है,
और अलसाई नज़रों से मसल कर देखता है सुबह के इशारे को...
मैं सफ़ेद दूध में उस दिन को सुबह का सुराग बेचता हूँ|


मैं सुबह की पहली चाय बेचता हूँ|

खोल दो !

खोल  दो  खिडकियों  को,  के  बरसों  से  हवा  ने  छुआ  नहीं  है
सीलन  आ  गयी  है  सोच  और  समझ, ख़्वाबों  और  ख्यालों  की  दीवारों  पर


जाम  हो  गए  हैं  दरवाज़े , अड़े  हुए  हैं  एक  ही  जगह  पर
बेहिसाब  से  झूलते  हैं  जाले परदों  पर ...


बू  भर  गयी  है  कमरों  में ,
मौसम  बदलते  देखा  ही  नहीं ...
जिद्दी  हैं  इस  घर  का  हर  कमरा ,
कोई  नया  सामान  आया , ना  पुराना  ही  बाहर  गया




खोल  दो  ये  खिड़कियाँ , कुण्डियों  को  आज़ाद  करो ,
दरवाजों  को  धक्का  मारो , उड़ने  दो  इन  परदों  को  भी
दीवारें  दम  भर  कर  ताज़ी  सांस  भर  लें , और  सामन  भी  धुप  सेक  ले


ज़रा  सी  हवा  छुए  तो  इनके  कानों  को  एक  नयी  आवाज़  मिले!