MySpaceShuttles is conceived out of my state of mind… The average oscillation between one thought to the other is not constant…my mood swings are about fifteen minutes from poetry and two minutes from absurd…So while it takes me no time to feel deeply and staunchly about a topic, it might take several debates in withdrawing my notions… But I enjoy swinging across various moods, traverse passions, go beyond realism & defy idealism.
Wednesday, February 15, 2012
Tuesday, February 14, 2012
मुझे दिन का इशारा मिल गया !
देखा तो कोई एक packet ज़िन्दगी चौखट पर रख गया था. बहार झाँका तो दिन रंगीन लगा और मौसम बेहतरीन. अंगडाई भी अब सोने का नहीं , जागने का इशारा कर रही थी …
चूल्हे पे उम्मीद चढ़ा कर अखबार उठाया …खबरें काफ़ी दिलचस्प लगीं. कहीं भी डर का निशान नहीं था , पूरा कागज़ एक colourful book लग रहा था.
Balcony में बैठ कर अखबार पढ़ना सालों की आदत थी तो अपनी सुबह की पहली चाय लेकर मैं बैठ गयी... पढ़ते- पढ़ते पड़ोसियों की आवाजों के साथ pressure cooker की सीटियाँ उनका ‘menu of the day’ बता गयीं …
First floor पे आलू के परांठे , second floor पे राजमा- चावल और मेरे floor पे दाल खिचड़ी … दूर से आती रफ़ी की आवाज़ में 'है अपना दिल तो आवारा' fade-out होता जा रहा था और 'कबाड़ी वाले' fade - in…
चाय की पहली चुस्की ऐसी लगी जैसे नया कुछ चख लिया हो.
तभी उबाल आया... मैं झट से रसोई में भागी और चूल्हा बंद किया... अब उम्मीद का रंग गाढा हो गया था , और स्वाद करारा.
बस क्या था… पलट दिया दिन के पतीले में और निकल पड़ी उसी सड़क पे जहां से रोज़ गुज़रती हूँ. लेकिन आज कुछ अलग था … आज मैं रास्ते से नहीं, रास्ता मुझ से होकर गुज़र गया.
पता चला के उस रास्ते पे मेरे अलावा और भी लोग चलते हैं , मिलते हैं , मुस्कुराते हैं , एक दुसरे के बारे में जानते हैं … आज मैं भी उनका हिस्सा थी … आज मुझे देखकर भी लोग मुस्कुराए और मैंने भी उस टीन की छत वाली दूकान पर बैठ कर चाय पी …
घर पहुँच कर लगा मानो एक दिन में मैंने कई सालों का फासला कम कर दिया था … कुछ मोड़ छूट गए थे रास्ते में , कुछ गलियां थीं जिनसे गुज़ारना भूल गयी थी … और कुछ घर ऐसे थे जिनमें मेरे दोस्त रहते थे …आज मैं उन सब से होकर आई!
उम्मीद का पतीला दिन ढलते- ढलते ख़त्म हो गया , लेकिन आज मुझे दिन के इशारे में ज़िन्दगी जीने का formula मिल गया …
-तूलिका झा को मेरी ओर से !
Monday, February 13, 2012
समय के परे!
ना तो फुर्सत है, ना दिन- रात का हिसाब ही है
ना मौसिक़ी है , ना हमारे हाथ में किताब ही है
रात दौड़ते हुए आती है और दिन छू के गुज़र जाता है ,
कुछ अंदाजा नहीं लगता और ये वक़्त उड्ड जाता है ...
वक़्त की रफ़्तार तेज़ ना कम होती दिखाई पड़ती है
चंद लम्हें चुरा लें खुद के लिए तो ये घड़ियाँ सिमटती हैं
आज कल तो मौसम बदलने का अंदाज़ा भी दूसरों के कपड़ों से लगता है
किस जगह गुजरेंगे आने वाले दिन, ये अखबारों की ख़बरों से लगता है
एक दिन दे दो लम्बा सा , रात को आते हुए तो देख सकें
रात में बैठें छत पे और दिन में धुप सेक सकें ...
आओगे इस बार तो ऐसा करना , दिन रात की चाबी घर पे छोड़ आना ..
जेब में भर कर वो ठहरा हुआ सा मोड़ लाना ...
बैठेंगे वहीं, महफ़िल सजायेंगे , समय के परे कुछ गप्पे लड़ायेंगे ...
खोल देंगे दिल-ओ - दिमाग की पोटली वहाँ ...
दिन है के रात, फर्क ही ना पड़ता हो जहां !!!
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