रात की अधूरी करवटें ताज़ी सुबह से समेटता हूँ,
कल जो कडवाहट बटोरी थी दिन भर...
उसे अद्रकी धुंए से धो कर खुरंचता हूँ|
रात से भाग कर, जब दिन अंगडाई लेता है,
और अलसाई नज़रों से मसल कर देखता है सुबह के इशारे को...
मैं सफ़ेद दूध में उस दिन को सुबह का सुराग बेचता हूँ|
मैं सुबह की पहली चाय बेचता हूँ|
कल जो कडवाहट बटोरी थी दिन भर...
उसे अद्रकी धुंए से धो कर खुरंचता हूँ|
रात से भाग कर, जब दिन अंगडाई लेता है,
और अलसाई नज़रों से मसल कर देखता है सुबह के इशारे को...
मैं सफ़ेद दूध में उस दिन को सुबह का सुराग बेचता हूँ|
मैं सुबह की पहली चाय बेचता हूँ|

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